चार फूल हैं और दुनिया है
साथ चलने की उम्मीद में
Winding down 2025 with this tender quiver of a poem, written by the gentlest giant of Hindi literature, Vinod Kumar Shukla, who passed away last week.
There is no language to express his loss better than his own.
A scene from a documentary on Vinod Kumar Shukla: “Chaar Phool Hain Aur Duniya Hai.” (Photo: Achalchitra, 2025)
शुक्ल जी ने अपने शब्दों से अपने लिए और अपने पाठकों के लिए एक ऐसी नर्म दुनिया बनायी थी जहाँ भरपूर ठहराव, सरलता और समझ थी। जहाँ हताशा की कड़ी धूप में इंसानियत की भीनी छाँव थी। जहाँ दो घड़ी ठहर कर साँस लेने की फुर्सत थी। जहाँ समय और सुलझते हुए अहसासों का मरहम, सीधे सादे शब्दों में दिल में उतर जाते।
उनका गुज़र जाना साहित्य की दुनिया के आसमान से एक चाँद के टूट जाने के बराबर है, जिसकी शीतल चाँदनी दीवारों में रहती खिड़कियाँ खोल कर हमारे घरों, दिलों और दुनिया को रूहानी रौशनी से भरती रही।
उनकी याद में और आने वाले नए साल के लिए, पेश है शुक्ल जी की ये कविता –
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
- विनोद कुमार शुक्लहताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता थाइसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता थाहम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
See you all on the other side. Happy New Year!


